मेटलर्जी और धातुकर्म का मिस्र ज्ञान

मेटलर्जी और धातुकर्म का मिस्र ज्ञान

 

1.धातुकर्म और धातु के काम के बारे में मिस्री ज्ञान

प्रारंभिक काल में ही मिस्रियों ने धातुओं का काम करना सीख लिया था, और इस बात पर सभी सहमत हैं कि 5,000 साल पहले ही प्राचीन मिस्रियों ने खनन, परिष्करण तथा धातु के निर्माण की तकनीक विकसित कर ली थी।

प्राचीन मिस्र में बहुत सारे खनिज अयस्क जैसे चांदी, तांबा, टिन, सीसा, आदि उपलब्ध नहीं थे, फिर भी उन्होंने बड़ी मात्रा में गिलट (सोना और चांदी का मिश्र धातु), तांबे और कांस्य के मिश्रधातु का उत्पादन किया। प्राचीन मिस्रियों ने मिस्र तथा अन्य देशों में खनिज अयस्कों की खोज के लिए अपनी विशेषज्ञता का उपयोग किया। प्राचीन मिस्रवासियों के पास, खनिज अयस्कों की तलाश, खनन व्यवस्थाओं की स्थापना, और भूमि तथा समुद्र में लंबी दूरी तक जाने के लिए, आवश्यक साधन और ज्ञान था।

प्राचीन जगत की सबसे बड़ी और सबसे अमीर आबादी होने के नाते, मिस्र में बड़ी मात्रा में कच्चे माल का आयात किया जाता था, और बदले में बड़ी मात्रा में तैयार माल निर्यात किया जाता था। प्राचीन मिस्र के बने धातु और गैर-धातु उत्पाद भूमध्यसागरीय बेसिन, यूरोपीय, एशियाई और अफ्रीकी देशों के मक़बरों में पाए जाते हैं।

मिस्रवासियों के पास रसायनशास्त्र व धातु आक्साइड के उपयोग का काफी ज्ञान था, जैसा कि विभिन्न रंगों के कांच व चीनी मिट्टी के उत्पादन की उनकी क्षमता से प्रकट होता है। प्राचीन मिस्रियों ने तांबे से खूबसूरत रंगों का उत्पादन किया, यह विभिन्न धातुओं की संरचना तथा विभिन्न पदार्थों पर धरती के लवणों के प्रभावों के बारे में उनके ज्ञान को दर्शाता है। यह रसायन विज्ञान और धातु विज्ञान की हमारी ‘‘आधुनिक’’ परिभाषा के साथ मेल खाता है।

  • रसायन विज्ञान पदार्थों की संरचना और गुणों से संबंधित विज्ञान है, जो पदार्थों के उत्पन्न होने या अन्य पदार्थों में परिवर्तित होने के कारणों, विशिष्ट विषय या गतिविधियों में उसके उपयोगों, उनके रासायनिक गुणों, संरचनाओं, प्रतिक्रियाओं, तथा उन पदार्थों के उपयोगों का अध्ययन करता है।
  • धातु विज्ञान धातुओं का विज्ञान है, जो खासकर धातुओं को उनके अयस्कों से अलग करने, गलाने, शोधन, आदि द्वारा इस्तेमाल के लिए तैयार किए जाने से संबंधित है।

धातु को पिघलाने, तपाने, जोड़ने, टांकने और उत्कीर्ण करने जैसे धातुकर्म न केवल बेहद प्रचलित थे, बल्कि वे अत्यधिक विकसित भी थे। प्राचीन मिस्री अभिलेखों में धातुकर्म के बारे में ढेरों संदर्भ की मौजूदगी से हमें प्राचीन मिस्र में इस उद्योग के महत्व का पता चलता है।

लक्सौर (थेबेस) व मिस्र के अन्य भागों से प्राप्त फूलदान, दर्पण, और कांस्य के उपकरण, मिस्रवासियों के धातुकर्म में प्रवीणता को सिद्ध करते हैं। उन्होंने कांस्य की संरचना बदलने के लिए धातु मिश्रण की कई विवेकपूर्ण विधियों को अपनाया। बर्लिन संग्रहालय में रखे ख़ंजर से यह पता चलता है कि, उन्हें कांस्य या पीतल के ब्लेड में एक निश्चित स्तर तक लोच लाने का रहस्य भी मालूम था। यह ख़ंजर अपने ब्लेड के लोच और बनावट की बारीकी तथा उत्कृष्टता के लिए उल्लेखनीय है। यूरोपीय संग्रहालयों में रखे हुए बहुत से प्राचीन मिस्री वस्तुओं में 10 से 20% टिन और 80 से 90% तांबा होता है।

धातु के लचीलेपन के बारे में उनका ज्ञान, धातु के तारों और धागे के निर्माण की उनकी क्षमता में स्पष्ट है। तार बनाने में, सोने और चांदी के साथ ही पीतल और लोहे जैसी सबसे लचीली धातुओं का इस्तेमाल किया जाता था। तार-निर्माण की प्रक्रिया से ही सोने के धागे और तार बनाए जाते थे, उन्हें चपटा करके ढाले जाने का कोई प्रमाण नहीं है। त्वत होमोसिस (तुथोमोसिस) तृतीय के मक़बरे में चाँदी के तार पाए गए थे, तथा सोने के तार, ओसीरतेसेन प्रथम के नाम वाली अँगूठियों से जुड़े मिले थे, जो त्वत होमोसिस तृतीय (1490-1436 ई.पू.) से 600 साल पुराने थे।

मिस्रवासियों ने धातु से धागा बनाने की कला को सिद्ध किया था। यह कपड़ा के बुनाई और गहनों के लिए काफी अच्छा था। कुछ ऐसे उत्कृष्ट लिनन मौजूद हैं, जिन पर सोने के धागे से पशुओं की अनेकों आकृतियां उकेरी गई हैं, ऐसे काम के लिए बेहद बारीकी और सफ़ाई की ज़रूरत होती है।

प्राचीन मिस्रवासी धातु के उत्पादों और वस्तुओं के निर्माण में बेहद उन्नत थे, और वे बड़ी मात्रा में अनेकों तरह के मिश्रण वाले मिश्र धातुओं का उत्पादन कर सकते थे। उनके ज्ञान की अभिव्यक्ति के उदाहरण आगे दिए गए हैं।

 

2. सुनहरे रजत (गिलट) के उत्पादः

प्राचीन मिस्रियों ने सोने का उपयोग किया, जो मिस्र की खानों से निकलते थे। उन्होंने चांदी का भी इस्तेमाल किया, जो मिस्र में नहीं पाया जाता था, मगर इबेरियन प्रायद्वीप से आयात किया जाता था। वे चांदी के मिश्र धातु में केवल चांदी या सोने-चांदी के मिश्रण का इस्तेमाल करते थे, इन्हें गिलट कहा जाता था। प्राचीन मिस्री अभिलेखों से संकेत मिलता है कि—ब्रह्मांड के ऊर्जा के स्रोत के रूप में—नेतेरू (देवी-देवता) गिलट के बने हैं। मूर्तियों, तावीज़ आदि जैसे धार्मिक वस्तुओं को बनाने के अलावा, इस मिश्रण को अक्सर व्यक्तिगत श्रृंगार और सजावटी वस्तुओं के लिए इस्तेमाल किया जाता था। चांदी और सोने का अनुपात आमतौर पर दो और तीन का होता था।  त्वत होमोसिस तृतीय (1490-1436 ईसा पूर्व) के काल के एक प्राचीन मिस्री पपाइरस से संकेत मिलता है कि एक अधिकारी ने काफ़ी ‘‘बड़ी मात्रा’’ में गिलट प्राप्त किया था, जिसका वज़न था-36,392 यूटेन, यानी 7,286 पाउंड अर्थात् 3,311 किलो 672 ग्राम।

ठीक तांबे और कांसे जैसे ही, सोने और चांदी से भी छोटी-छोटी मूर्तियाँ बनाई जाती थीं। ये दो धातुएं अक्सर ठोस मनके के रूप में पायी जाती हैं, जो कम से कम 6,000 साल पुरानी हैं।

बेनी हसन के मध्य साम्राज्य के मक़बरों के दृश्य सुनार के धंधे की तरफ़ इशारा करते हैं। इन मक़बरों में, सुनार के कई कार्यों को दर्शाया गया है, जैसे अयस्क को धोने की प्रक्रिया, फूँकने वाली नली की मदद से गलाने या पिघलाने की प्रक्रिया, सजावटी उद्देश्यों के लिए तैयार करना, वजन करना, सामग्री की सूची को दर्ज करना इत्यादि के साथ-साथ अन्य कामों को दर्शाया गया है।

जब सोना ठोस रूप में ढला नहीं होता था, तो यह समतल मोटाई की चपटी चादर होता था। सोने की चादर का इस्तेमाल फर्नीचर को सजाने के लिए किया जाता था। सोने की मोटी चादरों को सीधे लकड़ी पर ठोंका जाता और उसे छोटे-छोटे स्वर्ण कीलों की सहायता से जड़ दिया जाता था। पतली चादरों को प्लास्टर के बने आधार पर चिपकने वाले पदार्थ की सहायता से या शायद गोंद से चिपकाया जाता था। मूर्तियों, ममियों के मुखौटों, ताबूतों तथा अन्य वस्तुओं की कोटिंग में इस्तेमाल की गई चादरें बहुत अच्छी किस्म की थीं। इसे प्लास्टर की परत के उपर लगाया गया था, लेकिन इसके लिए मिस्री शिल्पकार द्वारा इस्तेमाल किए गए गोंद की पहचान नहीं हो सकी है।

मिस्रवासियों के ढेर सारी सामग्रियों के इस्तेमाल करने की क्षमता का पता, काहिरा के संग्रहालय में रखे, त्वतअंखआमेन (तूतनखामेन) के 300 पाउंड (136 किग्रा) के सोने के ताबूत से चलता है।

 

3. ताम्र और कांस्य के उत्पादः

प्राचीन मिस्र में तांबा और कांस्य के मिश्र धातु—तांबे, आर्सेनिक और टिन—बनाने के लिए खनिज अयस्कों की कमी थी—इसलिए इन्हें विदेशों से मंगाया जाता था। करीब 5000 साल से भी ज़्यादा पहले, प्राचीन मिस्रवासी बड़ी मात्रा में इन मिश्र धातुओं का निर्माण करते थे।

मिस्र का तांबा आर्सेनिक के मिश्रण से कठोर हो जाता था। कांसे के मिश्र धातु में आर्सेनिक की मात्रा ज़रूरत के अनुसार भिन्न-भिन्न होती थी। मिश्रण में भिन्नता के कई उदाहरण मौजूद हैं, जैसेः ख़ंजर और फरसे के धारदार किनारे काफ़ी सख़्त होते थे, जिनमें लगे तांबे में 4% आर्सेनिक होता था, जबकि फल और नोंक में 2 % आर्सेनिक वाला तांबा लगा होता था। आर्सेनिक वाले तांबे का इस्तेमाल राजवंश काल के पहले (5000 ईसा पूर्व), और और मध्य साम्राज्य (2040-1783 ई.पू.) के दौर में होता था।

प्राचीन मिस्री पत्थर (जिसे ‘‘पलेर्मो स्टोन’’ के नाम से जाना जाता है, जो अब पालेर्मो संग्रहालय में संग्रहीत है) पर दूसरे राजवंश के खासेखेमवइ (2890—2649 ई.पू.) की तांबे की प्रतिमा के निर्माण का ब्यौरा दर्ज है। काहिरा संग्रहालय में रखी, पेपी प्रथम (2889—2255 ई.पू.) की ताम्र प्रतिमा, धातु की मूर्ति का सबसे पुराना उदाहरण है। प्रारंभिक कृतियों की दुर्लभता का कारण निस्संदेह धातुओं की बहुमूल्य प्रकृति है, जिस वजह से धातुओं को बार-बार पिघला के पुनः उपयोग में लाया जाता था।

आर्सेनिक वाले तांबे के निर्माण के अलावा, प्राचीन मिस्रवासी कांस्य की वस्तुओं का भी निर्माण करते थे। तांबे में टिन का एक छोटा सा अंश मिलाने से कांस्य बनता है, जिससे गलनांक में कमी आती है, कठोरता में वृद्धि होती है और ढालना आसान हो जाता है। मिश्रण में टिन का अंश 0.1 % से 10% के बीच अलग-अलग होता है। अत्यंत प्राचीन काल की कई कांस्य वस्तुएँ पाई गई हैं। पेपी प्रथम (2289—2255 ई.पू.) के नाम वाले बेलन की साफ-सुथरी कटाव रेखाएं, तथा अन्य कांस्य लेख, इंगित करते हैं कि कांस्य वस्तुओं के निर्माण का इतिहास 2200 ईसा पूर्व से भी पुराना है।

कांस्य उद्योग देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। मिस्र में कांस्य को बड़े बर्तनों, उपकरणों और हथियारों के निर्माण के लिए तैयार किया जाता था। पुराने साम्राज्य (2575-2150 ई.पू.) के बाद से समूचे इतिहास में खरे कांस्य के कई उदाहरण मौजूद हैं, जैसे पोस्नो संग्रह, जो अब पेरिस के लौवर में संग्रहीत है।

कपड़े में बेहद ख़्याल से लपेटी गईं विभिन्न प्रकार की प्राचीन मिस्री घंटियाँ प्राप्त हुई हैं, जो मक़बरों में रखे जाने से पूर्व की अवस्था में हैं। काहिरा संग्रहालय में अब ऐसी ढेर सारी घंटियाँ रखी हुई है।

घंटे मुख्यतः कांस्य के बनते थे, लेकिन कभी-कभी वे सोने या चांदी से भी बनाए जाते थे। वे विभिन्न स्वरूपों के होते थे। कुछ घंटियों के मुख वाले भाग में दांत होते थे, जो पुष्प के पुटक के प्रतीक होते थे। प्राचीन मिस्री घंटियों के ढेर सारे ढांचे (काहिरा संग्रहालय में संग्रहीत, कैट. 32315 ए, बी) प्राचीन मिस्र में धातु की ढलाई का ठोस सूबूत पेश करते हैं। इन सांचों में तरल धातु डालने के लिए बने प्रवेश छेद स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। प्राचीन मिस्री घंटी के रासायनिक विश्लेषण में 82.4% तांबा, 16.4% टिन और 1.2 % सीसा पाया गया।

नए साम्राज्य के लेखों से पता चलता है, कि मिस्रवासी विभिन्न प्रकार का कांस्य मिश्र बनाते थे, जैसा कि इसमें ‘‘काले कांस्य’’ और ‘‘छह के संयोजन वाले कांस्य’’, अर्थात् छह गुना मिश्रण वाले धातु का उल्लेख आम है। इस तरह की विभिन्नताओं के कारण वे विभिन्न रंगों के होते थे। पीला पीतल जस्ता और तांबे का मिश्रण था। जबकि सफेद (और बेहतर) पीतल में चांदी का मिश्रण किया जाता था, जिनका प्रयोग दर्पणों के लिए किया जाता था, और इन्हें ‘‘कोरिंथियन पीतल’’ भी कहते हैं। इस यौगिक में तांबा के मिलाने पर लगभग सोने जैसा पीलापन उत्पन्न होता था।

तांबे और कांस्य से विभिन्न प्रकार के घरेलू बर्तनों, जैसे कि कड़ाह, घड़ा, कठौती, और कलछुल, के साथ-साथ, ख़ंजर, तलवार, भाला, और कुल्हाड़ियों, जैसे युद्धक हथियारों व उपकरणों के लिए भी सामग्री प्राप्त होती थी। पुराने और मध्य साम्राज्य के दौर में, युद्ध की कुल्हाड़ियों के गोल-गोल और अर्धवृत्ताकार स्वरूप का प्रचलन था।

बेनी हसन के मक़बरों के चित्रों जैसे मध्य साम्राज्य काल (2040-1783 ई.पू.) से जुड़े अभिलेखों में प्राचीन मिस्री हथियारों की विभिन्नताएं देखने को मिलती है, जैसे कि नीचे चित्रित ढाल के अलग-अलग तरह के दिलचस्प प्रकार।

नए साम्राज्य (1550-1070 ई.पू.) के दौरान प्राचीन मिस्रियों ने अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए एक बड़ी सेना की खड़ी की। मिस्रवासियों ने अपनी सेना में भाड़े के सैनिकों को रखा और उनके लिए आवश्यक युद्ध उपकरणों का निर्माण किया।

अठारहवें राजवंश (1575-1335 ई.पू.) के दौर में, एक सुरक्षित और समृद्ध मिस्र बड़ी मात्रा में धातु के सामानों का उत्पादन करने में सक्षम था। वस्तुओं की संख्या में इस वृद्धि के साथ-साथ खनन गतिविधियों में वृद्धि और इसी अवधि के दौरान इबेरियन मक़बरों में मिस्री तांबे और कांस्य वस्तुओं की संख्या में वृद्धि के बारे में अगले अध्याय के अंत में चर्चा की गई है।

करीब 5000 साल से भी ज़्यादा पहले, प्राचीन मिस्र में बड़ी मात्रा में तांबा, आर्सेनिक, और टिन की मांग पैदा हुई। इन तीनों खनिज अयस्कों का आयात, प्राचीन विश्व के एकमात्र ज्ञात स्रोत—इबेरिया से होता था। पुरातात्विक अभिलेख, दक्षिणी इबेरिया के तांबे और आर्सेनिक के खनिज संपदा के प्रारंभिक उपयोग को दर्शाते हैं। जहाँ तक टिन की बात है, तो हम ‘‘टिन मार्ग’’ के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं, जो इबेरियन प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर स्थित था, जहाँ टिन गैलिसिया और संभवतः कॉर्नवाल से आता था। स्ट्रैबो, अपनी ज्योग्राफी के खंड 3 में लिखता है, कि,

टिन … खोदा गयाऔर यह ल्यूसिटैनिया से दूर बर्बरों के देश तथा कैसिटिरिड्स द्वीप, दोनों में पैदा होता है और टिन ब्रिटिश द्वीप समूह से मैसिलिया लाया जाता है।

पूर्वी भूमध्य क्षेत्र—अर्थात् प्राचीन मिस्र—से आने वाले ‘‘टिन मार्ग’’ के साथ शुरुआती संपर्कों का प्रमाण मुस्तफ़ा ग़दाला द्वारा लिखित पुस्तक इजिप्शियन रोमनीः द एसेंस ऑफ हिस्पैनिया में दिया गया है।

 

4. चमकदार (कांच और शीशे) उत्पाद

प्राचीन मिस्रवासियों ने कई तरह के चमकीली वस्तुओं का निर्माण किया, वो भी पूर्व-राजवंश काल (5000 ई.पू.) से भी पुराने काल में। ये शुरुआती चमकते वस्तु आमतौर पर मनके की शक्ल में होते थे, जिनका कोर ठोस क्वार्ट्ज या साबुन पत्थर का होता था। साबुन पत्थर का प्रयोग तावीज़, पेंडेंट, और नेतेरू (देवी/देवताओं) की नन्हीं मूर्तियों जैसी छोटी चीज़ों को बनाने के लिए किया जाता था। साबुन पत्थर की बनी हुई चमकदार चीज़ें समूचे राजवंशीय काल (3050-343 ई.पू.) के दौरान मिलती हैं, और यह मिस्री गुबरैला बनाने की सबसे आम सामग्री थी। चमकदार तकनीक का इस्तेमाल अंत्येष्टि के उपकरणों (तावीज़, शबती की मूर्तियों) और घरेलू सजावट (टाइलों, पुष्प आकृतियों को जड़ना) की चीज़ें बनाने के लिए किया जाता था।

प्राचीन मिस्र की चमकदार वस्तुओं की विविधता और उच्च गुणवत्ता धातु विज्ञान के बारे में प्राचीन मिस्री ज्ञान को दर्शाता है। मिस्री शीशे का सबसे आम रंग नीला, हरा या नीला-हरा था। ये रंग तांबे के यौगिक को मिलाने के कारण उत्पन्न होता था। तांबे और चांदी का मिश्रण से सबसे शानदार परिणाम मिलते थे।

प्राचीन मिस्री कांच बेहद गर्म क्वार्ट्ज रेत और नैट्रॉन से बनते थे, जिनमं तांबे का मिश्रण या मैलाकाइट जैसे रंगने वाले पदार्थों को मिला कर हरे व नीले कांच तैयार किए जाते थे। आयात किये गये कोबाल्ट का भी उपयोग किया जाता था। सामग्री को पिघलाने के बाद, जब उसका द्रव्यमान इच्छित स्तर पर पहुँच जाता तो गर्माना रोक दिया जाता। तरल के ठंडा होने पर, उसे सांचे में डाल दिया जाता, या पतले छड़ों, कैन या अन्य रूपों में ढाल दिया जाता था।

शीशे को पिघलाने के चित्र, सक्कारा स्थित ताई के मक़बरे (2465-2323 ई.पू.), बेनी हसन (4000 वर्ष से पुराने) तथा अन्य मक़बरों में दर्शाए गए हैं।

चूंकि चमकीले रोगन को बनाने के लिए ठीक उन्हीं तत्वों को ठीक उसी तरीके पिघलाया जाता है, जैसे कांच में होता है, इसलिए कांच बनाने का श्रेय भी प्राचीन काल के मिस्रवासियों को ही मिलना चाहिए। सख़्त चमकदार रोगन में बिल्कुल शीशे जैसे गुण होते हैं। कांच के बर्तन बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक, दरअसल चमकदार पदार्थ बनाने की तकनीक का ही प्राकृतिक विस्तार है।

चौथे राजवंश (2575-2465 ई.पू.) के स्मारकों में कांच के बोतल दर्शाया गया है। मिस्र के रंग-बिरंगे कांच की बोतलों को यूनान, इट्रुरिया, इटली और अन्य देशों में निर्यात किया जाता था।

प्राचीन मिस्रवासियों ने कांच को रंग-बिरंगा स्वरूप प्रदान कर इन सामग्रियों के गुणों के बारे में अपने उत्कृष्ट ज्ञान को प्रदर्शित किया, जैसा कि लक्सौर (थेबेस) के मक़बरों में पाए गए टुकड़ों में दिखाई देता है। इस जटिल प्रक्रिया में उनके महारथ ने उन्हें कीमती पत्थरों का नकल कर पाने के काबिल बनाया। उनके द्वारा बनाए गए कुछ नकली मोती इतनी अच्छी तरह से नकल किए गए हैं कि किसी शक्तिशाली लेंस से भी असली और नकली में फ़र्क कर पाना मुश्किल है। प्लिनी ने इस बात की पुष्टि की है कि वे नकल में इतने पारंगत हो चुके थे कि बिल्कुल असली जैसा नकली बना सकते थे,

असली और नकली पत्थरों के बीच फ़र्क़ करना मुश्किल है।

इन नकली जवाहरातों के रंगों की छटा निराली है—पारदर्शी नीले रंग वाले लाजवर्त, चटख नीले नीलम और छींटदार सुनहरे रंग के कॉर्नेलियन मिस्र के आभूषण कला के सबसे प्रमुख नमूने हैं। लेकिन गोमेद, जमुनियाँ, और हेमटैट भी प्रचलन में थे। इसके अलावा, हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मिस्री कारीगरों ने बड़े-बड़े टुकड़ों को चित्रलेखों से सजा कर मीनाकारी का अद्भुत नज़ारा पेश किया।

विभिन्न टुकड़ों से कांच के मोजैक बनाये जाते थे, जिन्हें अलग-अलग बनाया जाता था, और फिर गर्मी से पिघला कर एक बना दिया जाता था। प्राचीन मिस्र के कांच के मोजैक अद्भुत और शानदार रंग के होते थे।

कांच का इस्तेमाल क्लौइजनाए के नाम से जानी वाली कला में भरपूर होता है, यह शब्द  धातु के कोषों पर कांच, फाईनेस या पत्थरों को सीमेंट के जोड़ कर की जाने वाले जड़ाऊ मीनाकारी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया के तहत कांच के पाउडर को क्लॉइसन में डाला जाता है, और उस पाउडर को तब तक गर्म किया जाता है जब तक वह पिघल कर सुगठित नहीं हो जाता।

प्राचीन मिस्र में कांच के बर्तन, टाइल और मिट्टी के अन्य चीज़ें मुख्य उद्योग थे। कुछ टाइल बेहद चमकीले और गहरे नीले रंग के बनाए जाते थे। वे धातु के इंद्रधनुषी चमक वाले मिट्टी के पात्र भी बनाते थे।

[बर्लिन के संग्रहालय में रखा, एक ही सर वाली तीन मछलियों और तीन कमल के फूलों की पेंटिंग से सजा मिट्टी का एक ख़ूबसूरत मिस्री कटोरा।]

कुछ टाइलों को धातु (तांबा, मैंगनीज, कोबाल्ट, आदि) के आक्साइड और क्षारीय सिलिकेट्स के पानी के साथ मिश्रण द्वारा बनाए गए रंगों से रंगा गया है। सक्कारा में लगभग 4,500 सालों से बेहतरीन गुणवत्ता वाली चमकदार टाइलें मिलती हैं। 1924-26 में लॉयर और फर्थ ने सक्कारा में स्टेप पिरामिड से केवल 700 फीट (300 मीटर) की दूरी पर स्थित ‘‘दक्षिणी मक़बरे’’ को बिल्कुल सुरक्षित अवस्था में खोजा था। ठीक स्टेप पिरामिड के दफ़न कक्षों की तरह ही इसके भी कई कक्ष नीली टाइलों से युक्त हैं।

 

5. लोहे के उत्पादः

हालाँकि पिरामिड ‘‘कांस्य और लौह युग’’ से पहले बनाए गए थे, फिरभी उस युग के लोगों को उल्के के लोहे का ज्ञान था। लोहे का प्राचीन मिस्री नाम ब्जा था। सक्कारा परिसर (लगभग 4,500 वर्ष पुराने) से प्राप्त यूनस के अंत्येष्टि (पिरामिड) लेखों में—यूएफटी—में ब्जा शब्द का बार-बार उल्लेख किया गया है-जो सितारे राजाओं की ‘‘हड्डियों’’ से संबंधित हैं।

मैं शुद्ध हूं, मैं अपने लिए अपने लोहे (ब्जा) की हड्डियां ले जाता हूँ, मैं अपने अविनाशी अंगों को फैलाता हूं जो नूत के गर्भ में हैं … (यूएफटी 530)

मेरी हड्डियां लौह (ब्जा) हैं और मेरे अंग अविनाशी तारे हैं। (यूएफटी 1454)

राजा की हड्डियां लौह (ब्जा) हैं और उसके अंग अविनाशी सितारे हैं … (यूएफटी 2051)

प्राचीन मिस्र में लोहे का उपयोग होता था, और मिस्री रेगिस्तान में लौह की खदानें देखी जा सकती हैं। हेरोडोटस ने पिरामिड के निर्माताओं द्वारा लोहे के औजारों के इस्तेमाल किए जाने का उल्लेख किया है। हेरोडोटस के बात की पुष्टि, उन्नीसवीं शताब्दी के मिस्री पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा विभिन्न स्थानों पर खोजे गए चिनाई के प्राचीन औजारों में शामिल लौह उपकरणों से होती है। इसके अलावा, लक्सौर (थेबेस) के स्मारक और यहां तक कि 4,500 साल पुराने मैम्फिस के आसपास के मक़बरों में कसाइयों को अपने एप्रन से जुड़े धातु के एक गोल टुकड़े पर अपने चाकूओं को तेज़ करते दिखाया गया है, जिसका नीला रंग उसके स्टील होने का संकेत देता है। रैमसेस तृतीय के मक़बरे में कांसे और लोहे के हथियारों के बीच भेद करने के लिए एक को लाल रंग से और दूसरे को नीले रंग से रंगा गया है, जिससे किसी शक़ की गुंजाइश नहीं बचती कि दोनों एक ही काल में प्रयोग किये जाते थे।

होमर ने अपने इलियड (XXIII, 261) में लोहे के इस्तेमाल की विशेष रूप से ज़िक्र किया है, कि जब लाल गर्म धातु को पानी में डुबोया जाता है तो वह कैसे फुंफकारता है।

पश्चिमी पंडितो द्वारा किया जाने वाला, ‘‘धातु विकास’’ (तांबा, कांसा, लोहा, इत्यादि) का मनमाना कालनिर्धारण बिल्कुल निराधार है। लोहे की जानकारी और उपयोग में आ जाने के बाद भी लंबे अर्से तक लगभग सभी राष्ट्र कांसे की तलवारों, ख़ंजरों, व अन्य हथियारों एवं रक्षात्मक कवचों का उपयोग करते रहे। पश्चिमी पंडित, मिस्रवासियों द्वारा लोहे के उत्पादों के बारे में ज्ञान और उपयोग से इनकार करते हैं, क्योंकि प्राचीन मिस्रवासियों ने कभी भी कांस्य वस्तुओं का उपयोग करना नहीं छोड़ा। दूसरी ओर कांसे के बने यूनानी और रोमन हथियारों को लेकर पश्चिमी पंडितों द्वारा कभी ऐसा दावा नहीं किया गया कि यूनानी और रोमन लोहे से अनजान थे। अतः प्राचीन मिस्रवासियों के लोहे के उत्पादों के ज्ञान और उत्पादन की बात को मनमाने ढंग से झुठलाया नहीं जा सकता।

 

6. मिस्र का खनन अनुभव

प्राचीन मिस्र की व्यवस्थित सभ्यता में मिस्रवासी अपने अभिलेखों को दर्ज करते थे, जिसमें खनन गतिविधियों की व्यवस्था और उनके अभियानों की प्रकृति के बारे में ब्यौरा मिलता है। प्राचीन मिस्र के बचे हुए अभिलेख, 5,000 वर्षों से भी पहले, मिस्र और मिस्र से इतर अनेकों स्थानों पर खनन गतिविधियों की जबरदस्त व्यवस्था दिखाते हैं।

सिनाई प्रायद्वीप में सेराबित-अल-ख़ादेम स्थित नीलम के खानों में विशुद्ध प्राचीन मिस्री शैली की खदान दिखाई देती है, जिसमें ध्यानपूर्वक तराशे गए कोनों के साथ लंबवत् एवं क्षैतिज मार्ग तथा गुफाओं का नेटवर्क है—ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन मिस्र के हर दौर के खदानों में होता था। प्राचीन मिस्रवासी पहाड़ों में गहरी और लंबी कटाई करने तथा खोदी गई शाफ्ट और सुरंगों को मज़बूत टेक व सहारा देने में सक्षम थे। सुरंगों और शाफ्टों में भूमिगत पानी के रिसाव को सुरक्षित रूप से बाहर पंप कर दिया जाता था। पानी के ये मिस्री पंप दुनिया भर में प्रसिद्ध थे, जिनका इस्तेमाल इबेरिया के खनन कार्यों में किया गया था, जिसकी पुष्टि स्ट्रैबो [जियोग्राफी, (3.2.9)]: के निम्न कथन से होती हैः

पोसीडोनियस का अर्थ है कि टर्डेटेनियन खनिक भी समान हैं, क्योंकि वे अपने खान में जाने वाले मार्ग को आड़ा और गहरा काटते हैं, और इस तरह खान के मार्ग में मिलने वाले लहरें उन्हें मिस्री पेंच के साथ परे हटा देती हैं।

बेहद धार्मिक मिस्रवासी प्रत्येक खनन स्थल पर स्मारक शिलापट्ट के साथ-साथ हमेशा मंदिरों/तीर्थों का निर्माण करते थे। ठीक यही परंपरा मिस्र से बाहर के खनन स्थलों पर भी देखने को मिलती है, जैसे कि इबेरियन प्रायद्वीप, जहाँ के खानों से चांदी, तांबा, आदि न जाने कब से निकाले जा रहे हैं।

सिनाई प्रायद्वीप में सेराबित-अल-ख़ादिम स्थित खनन स्थल ठेठ प्राचीन मिस्री खनन स्थल है, जिसमें ‘‘नीलम की नारी’’ कही जाने वाली, हथौर का छोटा सा मंदिर एक चट्टानी चबूतरे बना है, जो चौथे राजवंश (2575-2465 ई.पू.) या संभवतः उससे भी बहुत पहले का हो। बाद में इस मंदिर में नए साम्राज्य के राजाओं द्वारा वृद्धि की गई, खासकर त्वत होमोसिस तृतीय द्वारा। मंदिर के सामने, कम से कम आधे मील तक एक रास्ता है, जिस पर ढेर सारे विशाल शिलापट्ट लगे हैं, जो चारों तरफ़ से खनन अभियान से संबंधित वर्णनों से भरे पड़े हैं। समूचे मिस्र के प्रत्येक खनन स्थल पर कार्य का वर्णन करने वाले शिलापट्ट पाए जाते हैं।

सिनाई स्थित वादी मघारा की खदानों में, आज भी कामगारों के लिए पत्थरों की झोपड़ियों के साथ-साथ एक छोटा सा किला मौजूद है, जिसे वहां काम कर रहे मिस्रियों को सिनाई के बद्दुओं के हमलों से बचाने के लिए बनाया गया था। इन खदानों से पानी बहुत दूर नहीं था, और किले में पानी संरक्षित करने के लिए तालाब थे। वादी मग़ारा की खानें, संपूर्ण राजवंश काल (3050-343 ई.पू.) के दौरान सक्रिय रहीं।

रेदेसिएह के रेगिस्तानी मंदिर में उन्नीसवें राजवंश के शिलालेख बताते हैं, कि राजा सेती प्रथम (1333-1304 ईसा पूर्व) ने खनन कार्यों तथा खनन कर्मियों दोनों के लिए पानी उपलब्ध कराने हेतु कुआँ खोदने के लिए संगतराषों को नियुक्त किया था। जब कुआँ बन गया तब, एक स्टेशन और ‘‘मंदिर के साथ एक शहर’’ बनाया गया। रैमेसेस द्वितीय (1304-1237 ई.पू.), के उत्तराधिकारी, खनन स्थलों को जाने वाले सड़कों पर जहाँ कहीं भी ज़रूरत थी, वहाँ अतिरिक्त पानी उपलब्ध कराने हेतु कुआँ खोदने की योजना में मध्यस्थता की थी।

प्रत्येक खनन स्थल पर उनके वास्तविक योजनाओं के अनुरूप योजना बनाई जाती। स्थानों के मानचित्र वाली दो प्राचीन मिस्री पपायरी पाई गई हैं, जो कि फ़िरऔन सेती प्रथम तथा रेमेसस के शासनकाल के दौरान सोने के खनन से संबंधित है। आंशिक रूप से संरक्षित एक पेपिरस जो रैमेसेस द्वितीय के दौर का है, पूर्वी रेगिस्तान में बेचेन पर्वत के सोने वाले इलाके का प्रतिनिधित्व करता है। प्राप्त पेपिरस के स्थल योजना में एक पहाड़ी के बीच एक दूसरे के समानांतर दो घाटियां दर्शायी गयी हैं। रेगिस्तान की कई अन्य बड़ी घाटियों की तरह, इन घाटियों में से एक घाटी में पानी धार से मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए झाड़ियां और पत्थर हैं। तैयार स्थल योजना में उस स्थल से जुड़े अन्य प्रमुख विवरणों को दर्शाया गया है,  जैसे कि खनन स्थल के भीतर सड़क का नेटवर्क तथा बाहरी सड़क से उसका जुड़ाव, और ‘‘समुद्र की ओर जाने वाला मार्ग’’। इस स्थल योजना में अयस्क धातुओं के प्रशोधन (जैसे धुलाई, आदि), छोटे घरों, भंडारण क्षेत्रों, विभिन्न भवनों, छोटे मंदिर, व पानी की टंकी को दर्शाया गया है। खनन स्थल पर काम कर रहे श्रमिकों के लिए खाद्यान्न उगाने वाली खेती की ज़मीन को खनन स्थल के आसपास के क्षेत्र में दर्शाया गया है।.

.प्राचीन मिस्री अभिलेख खनन स्थलों के विभिन्न विभागों और श्रमशक्ति की विशेषताओं को भी दर्शाते हैं। प्राचीन मिस्री अभिलेख खनन कार्यों के संगठनात्मक ढांचे को दर्शाते हैं। प्राचीन मिस्र के बचे हुए अभिलेखों में विभिन्न अधिकारियों के नाम और पदनाम दिए गए हैं, जिन्होंने पुराने और मध्य साम्राज्यों के दौरान हम्मामत में काम का निर्देशन किया था, जो पूर्वी रेगिस्तान के बेचेन के खानों में स्थित है। उन्होंने इसमें इंजीनियरों, खनिकों, धातुकर्मियों, राजगीरों, वास्तुकारों, कलाकारों और सुरक्षा विवरणों के साथ-साथ जहाज़ के कप्तानों को शामिल किया जो अभियान के नौगम्य जल में पहुँचने पर जहाज़ों के भागों को व्यवस्थित रखते हैं।

नील नदी घाटी से होकर मिस्र की घनी आबादी वाले क्षेत्रों से भारी सुरक्षा के बीच गुज़रने से पहले, धातु अयस्क को खनन स्थल पर ही परिशोधित कर दिया जाता था।

मिस्र के खनन गतिविधियाँ बेहद व्यवस्थित थीं, जिसमें, लोग खनन स्थलों के काम की जांच करने, उचित संचालन सुनिश्चित करने तथा कर्मचारियों के नियमित रोटेशन के साथ ही साथ इन किलेनुमा कार्यस्थलों को सुविधाएं प्रदान करने के लिए आगे और पीछे यात्राएं करते थे।

प्राचीन मिस्री राजा पेपी प्रथम (2289—2255 ई.पू.) के दौर के अभिलेखों में खदानों के निदेशकों और खनन स्थल का निरीक्षण दौरा करने वाले उच्च अधिकारियों के नाम तथा पदनाम दिए गए हैं। शिलालेखों में कई पदनामों का उल्लेख मिलता है, जैसेः ‘‘समस्त कार्यों के मुख्य निरीक्षक’’, और ‘‘मुख्य वास्तुकार’’ आदि। इस बड़े आदमी ने हम्मामात का दो बार निरीक्षण दौरा किया—एक बार अपने सहायक के साथ, और एक बार बलिदान आयोग के अधिक्षक के साथ जब मंदिर की दीवारों पर धार्मिक लेखों की बात थी।

रैमेसेस चतुर्थ (1163-1156 ई.पू.) के शासनकाल के एक अभिलेख से एक अभियान के बारे में पता चलता है, जो पूर्वी रेगिस्तान के बेचेन के पहाड़ पर ‘‘कार्य अधीक्षक’’ के नेतृत्व में किया गया था।  इस अभियान में कुल 8,368 लोग शामिल थे। इन लोगों में 50 से अधिक सिविल अधिकारियों और पुजारियों के साथ ही साथ विभिन्न विभागों के 200 अधिकारी शामिल थे। क्षेत्र का कार्य खनिकों, संगतराषों और अन्य संबंधित कर्मियों द्वारा किया जाता था, जो तीन निरीक्षकों और ‘‘मुख्य निरीक्षक’’ के अधीन काम काम करते थे। श्रमिक कार्य 5000 खनिकों, धातुकर्मियों, राजगीरों आदि, तथा 2,000 विभिन्न प्रकार के श्रमिकों द्वारा पूरा किया जाता था। सुरक्षा बंदोबस्त के लिए भाड़े के 800 बर्बर सैनिकों की निगरानी के लिए कम से कम 110 अधिकारी होते थे। सुरक्षा बल की ज़रूरत, खनन स्थलों की सुरक्षा तथा सामग्री और लोगों के परिवहन के दौरान पड़ती थी। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का प्रबंधन करना असाधारण है—आज के ज़माने में भी 8,368 लोगों का मतलब है एक बड़ा समुदाय।

प्राचीन मिस्रवासी दूसरे देशों से कच्चे माल का आयात करते थे और खुद से हासिल विशेषज्ञता के बल पर समूचे आबाद जगत में खदानों को खोजते और कच्चे माल को ढोते थे। प्राचीन मिस्री खनन की विशिष्टताएं कई स्थानों पर पाई जाती हैं—जैसे कि इबेरिया।

 

[इसका एक अंश: इसिस :प्राचीन मिस्री संस्कृति का रहस्योद्घाटन- द्वितीय संस्करण द्वारा लिखित मुस्तफ़ा ग़दाला (Moustafa Gadalla) ] 

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