उंनत मिस्र चिकित्सा पुस्तकालय

उंनत मिस्र चिकित्सा पुस्तकालय

 

1.अंतर्राष्ट्रीय ख्याति

आज के दौर में दवा के पर्चे पर लिखे जाने वाले जाने पहचाने संकेत, आरएक्स की शुरुआत प्राचीन मिस्र में हुई थी। दूसरी शताब्दी में, गैलेन ने अपने मरीज़ों को प्रभावित करने के लिए रहस्यवादी प्रतीकों का इस्तेमाल किया था। इस काम के लिए, उसने मिस्री रूपक होरस की आँख को उधार लिया था। कहानी बताती है कि होरस ने अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए अपने चाचा सेत पर हमला किया था। इस लड़ाई में, होरस की आँख फूट जाती है, जिसे बाद में थोथ (तेहुति) ठीक कर देता है।

यह मिस्री आँख का चिन्ह कालांतर में, जाने-पहचाने आरएक्स के चिन्ह में बदल गया, जिसे आज दुनिया भर में दवाओं के पर्चे पर देखा जा सकता है, चाहे पर्चे की भाषा कोई भी हो। बहुत सारी दवाओं के नुस्खे प्लिनी, डियोस्कोराइड्स गैलेन तथा अन्य यूनानी लेखकों के लेखन के माध्यम से यूरोप पहुँचे।

वैरेन आर. डासन, द लिगेसी ऑफ इजिप्ट में, लिखते हैं:

प्राचीन लेखकों के काम… आमतौर पर वो बुनियादी माध्यम हैं, जिसके ज़रिए अधिकतर प्राचीन चिकित्सा विद्या यूरोप पहुंची, उनके अलावा जो सीधे उधार ली गईं… चिकित्सा की सबसे पुरानी पुस्तकें मिस्र से हैं, जिसमें शरीर रचना विज्ञान से संबंधित पहली टिप्पणियाँ हैं, शल्य चिकित्सा और औषधि विज्ञान के पहले प्रयोग हैं, खपच्चियों, पट्टियों व अन्य औजारों के आरंभिक प्रयोग हैं, तथा पहली शारीरिक और चिकित्सा शब्दावली है…

यह बिल्कुल साफ़ है कि मिस्री चिकित्सा विज्ञान की मांग और साख विदेशों में बहुत ज़्यादा थी। हेरोडोटस ने हमें बताया था कि साइरस और दारा दोनों ने मिस्र से इलाज कराया था। बाद के समय में भी, उनके कौशल की धाक कायम रहीः जैसा कि अम्यानुस का कहना था कि डॉक्टर के लिए इतना कह देना ही पर्याप्त था कि वह मिस्र का पढ़ा है। प्लिनी ने भी मिस्र से रोम जाने वाले चिकित्सकों का उल्लेख किया था।

मिस्रवासी जिस तरह से अपने स्वास्थ्य की देखभाल और ख़्याल करते थे, वो विदेशियों खासकर यूनानियों और रोमनों के लिए आश्चर्य की बात थी। प्लिनी का विचार था कि इतनी बड़ी संख्या में डॉक्टरों का मतलब है, कि मिस्र में बीमारियां बहुत ज़्यादा थीं—यह एक कुतर्क है। दूसरी ओर, हेरोडोटस ने बताया था कि मिस्रवासियों से ज़्यादा स्वस्थ कोई नहीं थे।

 

2. चिकित्सा पेशा

चिकित्सक

चिकित्सा व्यवहार की समूची तस्वीर को साफ़ करने के लिए, पुरातात्विक खोजों द्वारा सौ से अधिक डॉक्टरों के नामों और पदवी की सूची, पर्याप्त विवरण के साथ निश्चित किए गए। इमोहोप (तृतीय राजवंश) का नाम मिस्री दवाओं के साथ हमेशा के लिए जुड़ा, जिसे बाद में इलाज के यूनानी देवता, एसक्लेपियस के नाम से जाना गया।

यहाँ तक कि पुराने साम्राज्य के दौर में भी, चिकित्सा व्यवस्था का स्तर बेहद ऊँचा था, जहाँ डॉक्टरों की भिन्न-भिन्न विशेषज्ञता और श्रेणियां थीं। सामान्य चिकित्सकों के ऊपर पर्यवेक्षक, मुख्य चिकित्सक, वरिष्ठ चिकित्सक व अधीक्षक होते थे। सामान्य चिकित्सकों और शल्य चिकित्सकों के बीच अंतर रखा जाता था।

प्रत्येक चिकित्सक अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में अच्छी तरह से प्रशिक्षित और कुशल होते थे। मिस्री चिकित्सक बेहद माहिर होते थे। हेरोडोटस ने बताया है, कि वे अपनी विशेषज्ञता वाले क्षेत्र के अलावा किसी भी अन्य क्षेत्र का अभ्यास नहीं कर सकते थे।

प्राचीन मिस्र में, नेत्र चिकित्सक होते थे, आंतों के विशेषज्ञ (गुदा के रक्षक) होते थे, शरीर के तरल के संबंध में ज्ञान और विशेषज्ञता वाले आंतरिक रोगों के विशेषज्ञ होते थे, नाक के चिकित्सक होते थे, ऊपरी वायु मार्गों की बीमारियों से संबंधित चिकित्सक और पेट और दांतों के भी चिकित्सक थे।

संचालन और अभ्यास

मक़बरों और मंदिरों में कई तरह के शल्य उपकरणों और औज़ारों चित्रित किया गया है, जैसे किः

  • सक्कारा स्थित अंख-मैहोर, के मक़बरे में चिकित्सा और शल्यक्रिया से संबंधित बहुत सारे अनोखे भित्ति-चित्र मौजूद हैं। इनमें एक चकमक का चाकू है, जिसे कुछ लोग इसके प्राचीनता का सबूत मानते हैं। हाल के शल्य अनुसंधानों से प्राचीन काल के चकमक पत्थर का औचित्य स्पष्ट हो जाता है। यह पता चला कि आँखों व तंत्रिकाओं के कुछ आपरेशन में, लावा काँच का मुकाबला अच्छे से अच्छा स्टील भी नहीं कर सकता, इसलिए पुराने चकमक चाकू का आधुनिक रूप फिर से उपयोग में लौट रहा है।
  • कौम ओम्बो मंदिर की बाहरी गलियारे की दीवार पर, शल्य उपकरणों के बक्से का भित्तिचित्र बना है। बक्से में धातु की कतरनियां, चीरफाड़ का चाकू, आरी, जांच-उपकरण, लेपनी, छोटे हुक तथा चिमटियाँ शामिल हैं।

प्राचीन मिस्रवासी, राजवंश काल से भी पहले शल्य द्वारा उपचार करने लगे थे। ममियों की खोपड़ी को बड़े करीने से काटे जाने के संकेत मिले हैं, जो बेहद उन्नत स्तर के मस्तिष्क सर्जरी का परिचायक है। आपरेशन की प्रकृति का संकेत देने वाली कई खोपड़ियाँ पाई गई हैं, जिनमें कई खोपड़ी के कटे हुए खंड को मुख्य हड्डी के साथ सिला गया था, इससे साबित होता है कि आपरेशन के बाद रोगी ज़िंदा था।

हालाँकि ममियों में किसी भी तरह की शल्यक्रिया के चिन्ह (शव लेपन के चीरों को छोड़ कर) नहीं पाए गए हैं, लेकिन स्मिथ के पेपिरस में ‘‘टांके’’ के तेरह संदर्भ दिए गए हैं। पेपिरस ने यह भी उल्लेख किया गया है, कि घावों को चिपकने वाली टेप की सहायता से चिपकाया जाता था, जो लिलेन के बने होते थे। लिनन का उपयोग पट्टियों, बंधनों और टांके लगाने में भी किया जाता था। सुइयाँ संभवतः तांबे की हुआ करती थीं।

मिस्री चिकित्सक जिवाणुरहित (साफ़) घावों और संक्रमित (मवाद से भरे) घावों के बीच भेद करते थे। आरंभ में ‘रक्त’ या ‘बलग़म’ की जाँच का ज़िक्र है, बाद में ‘बदबूदार बहाव’ अथवा ‘मल’ की जाँच के बारे में बताया गया है। संक्रमित घाव को साफ करने के लिए इबेक्स की चर्बी, देवदार का तेल और पिसे हुए मटर के मिश्रण का मलहम के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। प्रत्येक मंदिर में एक विस्तृत प्रयोगशाला होती थी, जहाँ दवाएं बनाईं और रखीं जाती थीं।

जब जर्मन विद्वानों ने मिस्र की चिकित्सा पपायरी की पहली व्याख्या की तो वे दंग रह गए। उन्होंने मिस्री दवाओं को ‘‘कचरा औषधशास्त्र’’ का नाम दिया, क्योंकि मिस्रवासी, विभिन्न प्रकार के सूजनों, संक्रमणों और ज़ख्मों पर गोबर और वैसी ही दूसरी चीज़ें लगा कर इलाज करते थे।

हालिया दशकों में हुए पेनिसिलिन और एंटीबायोटिक दवाओं के आविष्कार के बाद हमें अहसास हुआ, कि प्राचीन मिस्री दरअसल इन्हीं दवाओं के मौलिक और जैविक संस्करणों का उपयोग करते थे। जिसे जर्मनों ने ‘‘कचरा औषधशास्त्र’’ कहा था, उसी को अब ‘‘आधुनिक चिकित्सा’’ कहा जाता है। इसके अलावा, मिस्रियों को विभिन्न प्रकार के एंटीबायोटिक दवाओं के बारे में पता था। उनके नुस्खे में विभिन्न बीमारियों के अनुसार एंटीबायोटिक दवाएं होती थीं।

मूर्तियाँ बनाने की प्राचीन मिस्री तकनीकों का अध्ययन करते हुए विद्वानों ने निष्कर्ष निकाला है, कि मिस्रवासियों को आँख की शारीरिक रचना की ही नहीं, बल्कि इसके अपवर्तक गुणों की भी जानकारी रही होगी। मिस्रियों ने इन गुणों का अनुमान, पत्थरों और क्रिस्टलों (एक आँख में चार अलग-अलग प्रकार के) की सहायता से लगाया था। जब इन मिस्री मूर्तियों की तस्वीरें ली जाती हैं, तो उनकी आँखें बिल्कुल असली लगती हैं।

 

3. चिकित्सा पुस्तकालय

200 ईस्वी के आसपास सिकन्दरिया में रहने वाले, क्लेमेन्स एलेक्जेंड्रिनस ने बताया था, कि प्रारंभिक राजवंशीय काल के मिस्री पुजारियों ने अपने समस्त ज्ञान को 42 पवित्र पुस्तकों में लिख रखा था, जिन्हें मंदिरों में रखा जाता और धार्मिक जुलूस में ले जाया जाता था। इन पुस्तकों में से छह पूरी तरह से दवा-इलाज से संबंधित थीं, जो शरीर रचना विज्ञान, सामान्य रोग, शल्य चिकित्सा, उपचार, आँखों की बीमारियों तथा स्त्री रोगों के बारे में बताती थीं।

बहुत सारी चिकित्सा पपायरी युगों से संरक्षित हैं। इसमें फेफड़े, यकृत, पेट और मूत्राशय के रोगों तथा सिर और खोपड़ी के विभिन्न बीमारियों के इलाज के नुस्खे दिए गए हैं, जिनमें बाल गिरने या पकने से रोकने वाले नुस्खे भी शामिल हैं। इनमें वातरोग, गठिया तथा स्त्री रोगों से संबंधित नुस्खे भी हैं।

ग़ैर-शारीरिक बीमारियों से संबंधित कई अन्य मिस्री पपायरी को पश्चिमी पंडितों ने ‘‘जादुई पपायरी’’ बताया। प्रमुख चिकित्सा पपायरी का सारांश निम्नलिखित हैः

एडविन स्मिथ पेपिरस

एडविन स्मिथ पेपिरस लगभग 1600 ई.पू. का है। लेख में पुराने साम्राज्य के शब्दों की उपस्थिति, बताती है कि इस पेपिरस को लगभग 2500 ईसा पूर्व के लेखों से नक़ल किया गया था, यानी जब पिरामिडों का निर्माण हुआ था।

यह दुनिया में सर्जरी की सबसे पुरानी पुस्तक है। इसमें सिर से लेकर निचले अंगों तक व्यवस्थित रूप से क्रमबद्ध, पीड़ादायक प्रकृति वाले, सर्जरी के कुल 48 मामले वर्णित हैं।

सभी मामलों में, सबसे पहले निदान के सारांश को व्यक्त करने वाला एक संक्षिप्त शीर्षक दिया गया है, जिसके बाद विस्तृत निदान दिया गया है, जिसमें संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट रूप से रोग की पहचान व कभी-कभी उसका इलाज दिया गया होता है।

निदान को गहन औेर बारीक निरीक्षण के बाद तय किया जाता था। इसके निष्कर्ष में तीन संभावनाएं बताई जाती थीं: चिकित्सक को पूर्ण सफलता मिल सकती है, या सफलता की थोड़ी संभावनाएं हैं जिनके लिए प्रयास किया जा सकता है, या कोई उम्मीद नहीं है और इस मामले में चिकित्सक को कुछ नहीं करना चाहिए।

तकनीकें बहुत सी और विविध प्रकार की थीं। फ्रैक्चर को ठीक से बिठाया जाता था, खपच्ची लगायी जाती थी, और घावों पर टांका लगाया जाता था। एक तरह का चिपकने वाला प्लास्टर होता था, जो टूटी हुई हड्डियों पर अद्भुत काम करता था। फ्रैक्चर के पूरी तरह से ठीक हो जाने की मिसालें कई ममियों में देखी जा सकती हैं।

इस पेपिरस की शुरुआत में बेहद रोमांचक वाक्य लिखे हुए हैं:

हृदय का हाल जानने के लिए उंगलियों पर कुछ भी गिना (जाए)। उसमें नसें होती हैं जो शरीर के हर हिस्से की ओर जाती हैं … जब कोई सेखमेत का पुजारी, या चिकित्सक … अपनी अंगुलियों को रखता है, सिर पर … दो हाथों पे, दिल के पास … तो यह बोलता है … हर नसों में, शरीर के हर हिस्से में।

चिकित्सा पेपिरस यह साबित करते हैं कि मिस्रियों ने रक्त संचरण में हृदय की भूमिका को जान लिया था, और उनका मानना था कि हृदय शरीर के जीवन का स्रोत है, और उन्होंने नब्ज़ को अनुभव किया तथा अपने नब्ज़ के साथ तुलना करके उसे मापा।

मिस्रवासियों का यह भी मानना था कि शरीर के सभी ‘‘आंतरिक रस’’ नसों के माध्यम से प्रवाहित होते हैं, जो दिल से निकलते हैं और गुदा पर एकत्रित होते हैं, जहाँ से उन्हें फिर से शरीर के विभिन्न भागों में पुनर्वितरित किया जा सकता है। आमतौर पर वायु, रक्त, मूत्र, बलग़म, वीर्य और मल समूचे तंत्र में समन्वय के साथ प्रवाहमान रहते हैं, लेकिन कभी-कभी यह तालमेल बिगड़़ जाता है और बीमारी उत्पन्न हो जाती है।

स्मिथ पेपिरस में मानव मस्तिष्क का शायद सबसे पहले दर्ज किया गया वर्णन हैः

जब आप किसी आदमी की जांच करें … जिसके सिर पर घाव हो, जो हड्डी तक जाता हो, और उसकी खोपड़ी टूट गई हो, टूटी हुई खुली खोपड़ी में उसका मस्तिष्क है… वक्र जो बहते हुए धातु में से उभरता है। कुछ ऐसा … जो आपकी उंगलियों के नीचे फड़कता (और) धड़कता है, जैसे किसी बच्चे के सिर का नर्म स्थान जो अभी पूरी तरह से परिक्व न हुआ हो… उसके दोनो नथनों से ख़ून बहता है।

आधुनिक तंत्रिकाविज्ञान में हुई तरक्क़ी से साबित हो जाता है, कि प्राचीन मिस्रवासी, तंत्रिका तंत्र की कार्यप्रणाली, तथा मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों व शारीरिक क्रियाकलापों के बीच के संबंध के बारे में विस्तार से जानते थे।

एबर्स मेडिकल पेपिरस

एबर्स मेडिकल पेपिरस लगभग 1555 ई.पू. का है। यह शरीर रचना तथा औषधिशास्त्र के शिक्षण की नियमावली मानी जाती है। इसमें 876 इलाजों का वर्णन है, और इलाज में काम आने वाले 500 अलग-अलग पदार्थों विवरण है।

एबर्स पेपिरस में जिन बीमारियों और उनके उपचार का विवरण है, उनमें शामिल है, पेट संबंधी शिकायतें, खांसी, सर्दी, दंश, सिर की बीमारियां, यकृत की समस्याएं, जलने तथा अन्य प्रकार के घाव, खुजली, फोड़े, सिस्ट आदि, उंगलियों तथा पैर की उंगलियों की समस्याएं, नसों, मांसपेशियों और तंत्रिकाओं में ज़ख़्म व दर्द के लिए मरहम, जीभ के रोग, दांत के दर्द, कान के दर्द, स्त्रियों के रोग, सौंदर्य प्रसाधन, और कीड़ां के लिए घरेलू उपाय, हृदय व शिराओं से संबधित दो पुस्तकें और ट्यूमर का निदान।

बर्लिन पेपिरस

बर्लिन पेपिरस की तिथि 1350 से 1200 ईसा पूर्व के बीच की है।

यह प्रसव और शिशुओं के बारे में बताता है।

इसमें गर्भावस्था के परीक्षण का विवरण दिया गया है, जिसमें बताया गया है कि मूत्र में गर्भावस्था के संकेत मौजूद होते हैं। इसमें स्त्री के मूत्र में कुछ गेहूं और कुछ जौ के दानों को भिगोने की सलाह दी गई है। अगर गेहूं के अंकुरित हुआ, तो लड़का होगा, और यदि जौ अंकुरित हुआ तो लड़की।

1963 में गैलियोनगुई ने पाया कि गैर-गर्भवती स्त्रियों का मूत्र जौ और गेहूं के अंकुरण में बाधा उत्पन्न करता है, हालाँकि इससे यह भी साबित हुआ कि अनाज के विकास की दर से किसी अजन्में बच्चे के लिंग का पता लगाना असंभव है, संभवतः इसका कारण वर्तमान और प्राचीन मिस्र के अनाज और मिट्टी में अंतर है। जो भी हो, मगर मिस्रियों का जानना कि मूत्र में गर्भावस्था के संकेत होते हैं, यही अपनेआप में असाधारण है। गर्भावस्था के लिए मूत्र परीक्षणों का विश्वसनीय मानकीकरण 1929 तक नहीं हुआ था।

यह जान कर हैरत होती है कि यह नुस्खा मिस्र से चलकर यूरोप जा पहुँचा, जैसा कि सत्रहवीं शताब्दी की एक शानदार पुस्तक में, पीटर बोयर ने लिखा हैः

ज़मीन में दो छेद करें, एक में जौ और दूसरे में गेहूं डालें, फिर गर्भवती स्त्री का द्रव लेकर दोनों में डाल दें, फिर उस ज़मीन को वापस ढँक दें। अगर गेहूं पहले अंकुरित हुआ, तो लड़का होगा, और यदि जौ पहले अंकुरित हुआ तो लड़की होगी।

द एक्सपीरियंस्ड मिडवाइफ नामक एक छोटी सी अंग्रेजी किताब है, जिसमें भी यह नुस्खा थोड़े संशोधित रूप में दिखाई देता है।

हस्र्ट पेपिरस

इसकी तिथि 1550 ईसा पूर्व के आसपास निर्धारित की गई है, और यह चिकित्सकों के लिए दिशानिर्देश जैसा प्रतीत होता है। इसमें 250 से अधिक नुस्खे और मंत्र दिए गए हैं, जिसके अलावा इसमें हड्डियों, दंशों, उंगलियों की पीड़ा, ट्यूमर, जलने, स्त्री रोग, कान, आँख और दाँतों से संबंधित समस्याओं के बारे में एक खंड है।

 

4. इलाज और नुस्खे

प्राचीन मिस्रियों को प्राकृतिक चिकित्सा और जड़ी-बूटियों के उपयोग का पूरा ज्ञान था, जिसमें उनके महारत का आलम ऐसा था कि वे इसकी मदद से अपने मृतकों के शवों का लेपन किया करते थे, एक ऐसा कमाल जिसे आधुनिक मानव आज तक दोहरा नहीं पाया।

एबर्स और हस्र्ट पपायरी, के साथ-साथ अन्य चिकित्सा पपायरी में बताए गए विभिन्न नुस्खे काफी तर्कसंगत हैं, जो लक्षणों के उपचार के लिए प्राकृतिक इलाज बताते हैं। ये नुस्खे, पौधों, पशुओं और खनिजों के साथ-साथ मानव शरीर के सामान्य शारीरिक गुणों और क्रियाओं के बारे में ज्ञान का नतीजा हैं।

अकेले एबर्स पेपिरस में 876 इलाजों का वर्णन है, और इलाज में काम आने वाले 500 अलग-अलग पदार्थों विवरण है। इसमें प्लास्टर, बाम और मलहम जैसी बहुत सी दवाओं के बनाने की विधि दी गई है—जिसमें वनस्पति, खनिज, और पशुओं के तत्वों का उपयोग होता था।

सामग्रियों को कभी पीसा जाता तो कभी उबाला या फेंटा जाता था। कुछ को कपड़े से छान लिया जाता, तो कुछ को साफ़ पानी, बीयर, शराब, तेल या दूध में घोल लिया जाता था।

एबर्स पेपिरस से हमें पता चलता है कि एक नुस्खे में कभी-कभी घटकों की संख्या 35 तक हो जाती थी।

नुस्खे कई तरीकों से दिए जाते थे, जैसे पेय पदार्थ या गोलियों के रूप में या मालिश के तेल या सिंकाई के माध्यम से। कुछ नुस्खों को सूंघा भी जाता था।

वे अपने नुस्खे को बहुत सावधानी से तौलते और मापते थे।

दवा की ख़ुराक, रोगी की आयु, वजन और लिंग के अनुसार अलग-अलग होती थी।

चिकित्सीय गुणों वाले पौधे जाने-पहचाने होते थे। जो औषधीय पौधे मिस्र में नहीं उगते थे उन्हें बाहर से आयात किया जाता था। सीरिया और एशिया माइनर से देवदार का आयात किया जाता था, जिसके तीक्ष्ण राल का एंटीसेप्टिक और शव के लेपन सामग्री के रूप में इस्तेमाल होता था। देवदार के तेल का इस्तेमाल संक्रमित घावों को साफ़ करने के अलावा कृमिनाशक के रूप में भी किया जाता था। नाक का ज़ुकाम ठीक करने में काम आने वाला मुसब्बर तथा खुश्बू एवं मसूढ़ों की समस्या के मरहम के रूप में काम आने वाली दालचीनी को पूर्वी अफ्रीका से मंगाया जाता था।

शहद, अधिकतर दवाओं में एक महत्वपूर्ण घटक होता था।  शहद में जीवाणु वृद्धि के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधक क्षमता होती है। इन्हिबिन नामक जीवाणुनाशक एंजाइम की उपस्थिति के कारण इसमें एंटीबायोटिक गुण भी होता है। आधुनिक अध्ययनों में शहद, स्टेफिलोकोकस, साल्मोनेला और कैंडिडा बैक्टीरिया के खिलाफ प्रभावी साबित हुआ है। यह भी, सर्जरी के घाव, जलने और अल्सर के इलाज के में पारंपरिक इलाज से कहीं ज़्यादा प्रभावी होता है।

मधुमक्खी से प्राप्त एक और उत्पाद प्रापलिस (मधुमक्खी का गोंद) है, कठोर राल जैसे इस पदार्थ को मधुमक्खियाँ पौधे के रस बनाती हैं, और अपने छत्ते के दरारों को भरने में इस्तेमाल करती हैं। प्रापलिस में एंटीबायोटिक के साथ ही परिरक्षक का गुण भी होता है। 3,000 साल पहले प्राचीन मिस्र में एक छोटा सा चूहा मधुमक्खी के छत्ते में घुस गया था, जिसे बाद में पूरी तरह से संरक्षित अवस्था में पाया गया, वह पूरी तरह से प्रोपोलिस में लिपटा हुआ था और उसमें अपघटन के कोई संकेत नहीं थे।

बीयर का भी उल्लेख एक घटक के तौर पर किया गया है, जिससे कई दवाएं बनती थीं, और साथ ही बियर एक लोकप्रिय और स्वस्थ पेय भी था।

उन्हें ख़मीर के लाभों और उपयोग की जानकारी थी, वे छालों और अल्सर पर इसे कच्चे रूप में लगाते थे तथा पाचन की गड़बड़ियों को दूर करने के लिए इसे निगलते थे। ख़मीर में विटामिन बी के साथ-साथ एंटीबायोटिक तत्व होते हैं।

जैसा कि पहले चर्चा की जा चुकी है, प्राचीन मिस्र में घावों तथा खुले ज़ख्मों के इलाज के लिए एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग किया जाता था।

संक्षेप में, प्राचीन मिस्र के औषधीय उत्पाद बेहद उन्नत थे जिनका अपना रुतबा था, जिसका उल्लेख प्लिनी ने अपने लेखन में बार-बार किया है।

होमर के ओडिसी में, थोनिस की पत्नी पोलिडैम्ना ने हेलेन को कई कीमती दवाइयां दी थी जब वह मिस्र में थी,

एक देश, जिसके उपजाऊ मिट्टी में अनंत औषधियां पैदा होती हैं, जिसमें से कुछ लाभदायक हैं और कुछ हानिकारक, जहाँ का हर एक चिकित्सक अन्य सभी लोगों से ज़्यादा ज्ञान रखता है।

 

[इसका एक अंश: इसिस :प्राचीन मिस्री संस्कृति का रहस्योद्घाटन- द्वितीय संस्करण द्वारा लिखित मुस्तफ़ा ग़दाला (Moustafa Gadalla) ] 

पुस्तक सामग्री को https://egypt-tehuti.org/product/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF/


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